2026: अमेरिका-ईरान युद्ध की भयानक आहट! ट्रंप के बड़े फैसले और सैन्य हलचल

हाल के दिनों में डोनाल्ड ट्रंप के बयानों और अमेरिकी सेना की गतिविधियों ने अमेरिका-ईरान युद्ध की आशंकाओं को फिर से हवा दे दी है। एक तरफ जहां ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से ईरान में ग्राउंड ऑपरेशन के लिए सेना न भेजने का ऐलान किया, वहीं कुछ ही घंटों बाद सबसे बड़ा सैन्य मूवमेंट शुरू कर दिया गया। हजारों की संख्या में अमेरिकी सैनिक और घातक सैन्य साजो-सामान ईरान की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे पश्चिम एशिया में तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है।

मुख्य बिंदु

  • डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान में ग्राउंड ऑपरेशन से इनकार करने के तुरंत बाद सबसे बड़े सैन्य मूवमेंट का आदेश दिया।
  • हजारों अमेरिकी सैनिक और अत्याधुनिक हथियार लेकर अमेरिकी नौसेना के जहाज ईरान की ओर रवाना हो चुके हैं।
  • ट्रंप ने वियतनाम युद्ध के कड़वे अनुभवों को नजरअंदाज करते हुए कहा कि उन्हें ‘दूसरा वियतनाम’ होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।
  • यूरोपीय देशों और नाटो के युद्ध में सीधे शामिल न होने की शर्त पर ट्रंप ने उन्हें ‘कायर’ करार दिया, जिससे गठबंधन में दरारें और गहरी हुई हैं।

ट्रंप का यू-टर्न: ईरान में ग्राउंड ऑपरेशन का ऐलान?

डोनाल्ड ट्रंप, जो हर रोज मीडिया के सामने आकर अपने बयान बदलते हैं, एक बार फिर अपने पुराने रुख से पलट गए हैं। कल ही उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ तौर पर कहा था कि वह ईरान में किसी भी ग्राउंड ऑपरेशन के लिए सेना नहीं भेज रहे हैं। लेकिन उनके इस बयान के कुछ ही घंटों बाद, अमेरिकी सेना ने ईरान की तरफ सबसे बड़ा सैन्य मूवमेंट शुरू कर दिया। हजारों सैनिक युद्ध के लिए पहुंच रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि ट्रंप का असली इरादा कुछ और ही है। उन्होंने पहले भी कहा था कि वह युद्ध से न तो थकते हैं और न ही बोर होते हैं, और ईरान में ग्राउंड ऑपरेशन में जरा भी नहीं हिचकेंगे।

अमेरिका-ईरान युद्ध

युद्ध का जुनून या वियतनाम की यादें?

ट्रंप से जब यह सवाल किया गया कि ईरान से जमीनी लड़ाई वियतनाम की तरह ही मुश्किल हो सकती है, तो उन्होंने बेफिक्री से कहा कि चाहे यह दूसरा वियतनाम युद्ध ही क्यों न हो जाए, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। यह बयान उनकी युद्ध के प्रति जुनून को दर्शाता है, लेकिन इतिहास हमें कुछ और ही बताता है। अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति के लिए यह जरूरी है कि वह इतिहास से सबक लें, खासकर तब जब वियतनाम जैसे एक छोटे देश ने अमेरिका को घुटनों पर ला दिया था।

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वियतनाम से नहीं सीखा सबक अमेरिका ने?

अमेरिका ने 1955 में वियतनाम से कम्युनिज्म खत्म करने के लिए ग्राउंड ऑपरेशन शुरू किया था। अमेरिका को लगा था कि वह वियतनाम को बहुत जल्द हरा देगा, लेकिन वियतनाम के कम्युनिस्ट सैनिकों ने जंगलों से गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया। यह युद्ध 1955 से 1975 तक, यानी पूरे 20 साल चला। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस युद्ध में अमेरिका के 58 हजार से ज्यादा सैनिक मारे गए और लाखों डॉलर्स का नुकसान हुआ। बावजूद इसके, **ट्रंप** अपनी जिद पर अड़े हैं और उनकी सेना ईरान के खिलाफ **ग्राउंड ऑपरेशन** के लिए निकल पड़ी है। अमेरिकी नीति निर्माताओं ने वियतनाम युद्ध से कई सबक सीखे, लेकिन लगता है ट्रंप ने उन्हें भुला दिया है।

ईरान की ओर अमेरिकी फौज का विशाल बेड़ा

अमेरिका ने अपनी पूरी ताकत के साथ ईरान की ओर **सैन्य अभियान** तेज कर दिया है। बॉक्सर एम्फीबियस रेडी ग्रुप और 11वीं मरीन एक्सपीडिशनरी यूनिट को रवाना कर दिया गया है। ये जहाज इंडो-पैसिफिक रास्ते से होते हुए पश्चिम एशिया पहुंचेंगे। बॉक्सर एम्फीबियस रेडी ग्रुप में तीन मुख्य जहाज शामिल हैं:

  • USS बॉक्सर: यह मुख्य असॉल्ट शिप है जिससे हमला होगा।
  • USS पोर्टलैंड और USS कॉमस्टॉक: ये दोनों ट्रांसपोर्ट डॉक शिप हैं, जिनका उपयोग भारी-भरकम हथियारों और उपकरणों को ले जाने के लिए किया जा रहा है।

इन तीनों जहाजों पर 4 हजार से ज्यादा मरीन्स और सैनिक तैनात हैं। USS बॉक्सर पश्चिम एशिया पहुंचकर USS त्रिपोली से जुड़ जाएगा, जिस पर पहले से 2200 मरीन्स तैनात हैं। इस तरह ईरान के पास कुल अमेरिकी सैनिक और मरीन्स की संख्या लगभग 8000 तक हो जाएगी। यह होर्मुज स्ट्रेट में एक विशाल सैन्य उपस्थिति है।

भेजे जा रहे घातक हथियार

इन जहाजों से कई प्रकार के अत्याधुनिक और घातक हथियार भी ईरान की ओर भेजे जा रहे हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • F-35B स्टेल्थ फाइटर जेट
  • MV-22 ऑस्प्रे (टिल्ट-रोटर एयरक्राफ्ट)
  • CH-53E भारी हेलीकॉप्टर
  • AH-1Z वाइपर अटैक हेलीकॉप्टर
  • UH-1Y वेनम यूटिलिटी हेलीकॉप्टर
  • A-10 Warthog विमान
  • अपाचे हेलीकॉप्टर
  • 5000 पाउंड के बंकर बस्टर बम

यह सब मिलकर एक ही संदेश दे रहे हैं कि अगर जरूरत पड़ी, तो अमेरिका तेजी से हमला कर सकता है और **ईरान** की जमीन पर कब्जा करते हुए ग्राउंड ऑपरेशन चला सकता है।

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नाटो से खफा हुए ट्रंप, कायरों कह कर साधा निशाना

इस संभावित अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच, इटली, जर्मनी और फ्रांस जैसे यूरोपीय देशों ने **होर्मुज स्ट्रेट** से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही के लिए मदद की पेशकश की है। हालांकि, उन्होंने युद्ध में सीधे शामिल न होने और बातचीत का रास्ता अपनाने की शर्त रखी है। ट्रंप के दिमाग में सिर्फ युद्ध और ग्राउंड ऑपरेशन की बात है, जिससे वह यूरोपीय देशों के इस रुख से नाराज हो गए हैं।

जब यह तस्वीर तेजी से साफ हो गई कि अमेरिका **होर्मुज** में ग्राउंड ऑपरेशन कर सकता है, और यूरोपीय देश उनका खुलकर युद्ध में साथ नहीं दे रहे हैं, तो ट्रंप ने ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक लंबा-चौड़ा पोस्ट लिखा। इसमें उन्होंने नाटो देशों को ‘कायर’ कह दिया। नाटो को ‘कागजी शेर’ बताते हुए भड़क गए और बोले, ‘कायरों अमेरिका तुम्हें याद रखेगा।’ ट्रंप के इस लेटेस्ट बयान से साफ है कि अमेरिका और नाटो में खाड़ी के युद्ध से बनी दरार अब और चौड़ी होती जा रही है। ब्यूरो रिपोर्ट, टीवी9 भारतवर्ष।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1: डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर क्या नया फैसला लिया है?
A1: डोनाल्ड ट्रंप ने पहले ईरान में ग्राउंड ऑपरेशन के लिए सेना न भेजने का बयान दिया, लेकिन कुछ घंटों बाद ही उन्होंने ईरान की ओर सबसे बड़े सैन्य मूवमेंट का आदेश दे दिया, जिसमें हजारों सैनिक और भारी हथियार भेजे जा रहे हैं।

Q2: अमेरिका ईरान में ग्राउंड ऑपरेशन क्यों शुरू कर रहा है?
A2: ट्रंप ने पहले कहा था कि वे युद्ध से नहीं थकते और ईरान में ग्राउंड ऑपरेशन करने से नहीं हिचकेंगे। हालांकि, इस सैन्य अभियान का सटीक कारण या लक्ष्य अभी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है, लेकिन यह ईरान पर दबाव बनाने या संभावित सैन्य कार्रवाई की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है।

Q3: वियतनाम युद्ध से अमेरिका ने क्या सबक नहीं सीखा?
A3: वियतनाम युद्ध 20 साल तक चला और इसमें अमेरिका के हजारों सैनिक मारे गए और लाखों डॉलर्स का नुकसान हुआ। इसके बावजूद ट्रंप ने कहा है कि उन्हें ‘दूसरा वियतनाम’ होने से कोई फर्क नहीं पड़ता, जिससे यह लगता है कि उन्होंने इतिहास से सबक नहीं सीखा है।

Q4: नाटो देशों ने अमेरिका के सैन्य अभियान पर क्या प्रतिक्रिया दी है?
A4: इटली, जर्मनी और फ्रांस जैसे नाटो देशों ने होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही के लिए मदद की पेशकश की है, लेकिन उन्होंने युद्ध में सीधे शामिल न होने और बातचीत का रास्ता अपनाने की शर्त रखी है। इस पर ट्रंप ने नाटो को ‘कायर’ और ‘कागजी शेर’ बताते हुए नाराजगी व्यक्त की है।

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