मुख्य बिंदु
- स्ट्रेट ऑफ होर्मुज सिर्फ 20 मील चौड़ा है और वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 25% नियंत्रित करता है।
- ईरान ने 1979 की क्रांति के बाद इस पर अपना अधिकार जताया है और इसे बंद करने की धमकी देता रहा है।
- कभी ब्रिटेन ने ईरानी तेल पर एकाधिकार किया था और राष्ट्रीयकरण के जवाब में होर्मुज की नाकाबंदी कर दी थी।
- 1953 में अमेरिका और ब्रिटेन ने ईरान में तख्तापलट कराकर तत्कालीन प्रधानमंत्री मोसादेघ को हटा दिया था।
दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण जलमार्गों में से एक, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, फारस की खाड़ी के मुहाने पर स्थित एक संकरा समुद्री मार्ग है। यह न केवल व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि अपनी रणनीतिक स्थिति के कारण हमेशा से भू-राजनीतिक तनावों का केंद्र रहा है। वर्तमान में, इस पर ईरान का नियंत्रण और उससे जुड़े संभावित टकराव 2026 तक वैश्विक तेल बाजार और कूटनीति पर गहरा असर डाल सकते हैं।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज: वैश्विक तेल आपूर्ति की जीवनरेखा
फारस की खाड़ी में स्थित स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अपने सबसे संकरे बिंदु पर मात्र 20 मील चौड़ा है। यही कारण है कि यह ईरान, इराक, कुवैत और सऊदी अरब जैसे खाड़ी देशों से प्रतिदिन 2 करोड़ बैरल तेल ले जाने वाले टैंकरों के लिए एक भौगोलिक ‘चोक पॉइंट’ बन जाता है। इस जलमार्ग पर जिसका भी नियंत्रण होता है, वह वैश्विक तेल आपूर्ति के लगभग 25 प्रतिशत हिस्से को नियंत्रित करता है।
ईरान और होर्मुज पर उसका ऐतिहासिक दावा
1979 की क्रांति के बाद का तनाव
1979 की ईरानी क्रांति के बाद से, जब शाह को सत्ता से बेदखल कर ईरान में इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई, ईरान ने होर्मुज पर अपना अधिकार जताया है। इसके बाद दशकों से अमेरिका के साथ तनावपूर्ण संबंधों के दौरान, ईरानी शासन ने बार-बार स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने और वैश्विक तेल बाजार में अराजकता फैलाने की धमकी दी है। पिछले महीने ईरान पर हमले के साथ ही यह रास्ता बंद कर दिया गया। हालांकि, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर हमेशा से ईरान का कब्जा नहीं था।
जब अंग्रेजों ने ईरान के तेल पर किया था कब्जा
एंग्लो-पर्शियन ऑयल कंपनी और तेल का राष्ट्रीयकरण
एक समय था जब ईरान के तेल पर अंग्रेजों का एकाधिकार था। ईरान के तेल का सबसे ज्यादा दोहन ब्रिटेन ने ही किया। 1908 में ईरान में तेल की खोज के बाद अंग्रेजों ने सबसे ज्यादा इसका दोहन किया। ईरानी तेल के दोहन के लिए ब्रिटेन ने शुरुआत में एंग्लो-पर्शियन ऑयल कंपनी बनाई जो बाद में बीपी (ब्रिटिश पेट्रोलियम) बनी। इस कंपनी ने 1933 में ईरान के तेल निर्यात पर नियंत्रण पाने के लिए एकतरफा समझौता किया था।
अंग्रेजों की नाकाबंदी और मोसादेघ का साहस
हिस्ट्री चैनल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, डेलावेयर विश्वविद्यालय के इतिहास के प्रोफेसर रुडोल्फ मैथी का कहना है कि 1951 में ईरानी प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेघ ने घोषणा की कि ईरान अपने तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर रहा है, जिसमें उस समय अबादान में स्थित दुनिया की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी भी शामिल थी। प्रधानमंत्री मोसादेघ ने तेल का राष्ट्रीयकरण करके अंग्रेजों को चुनौती देने का दुस्साहस किया, यह तर्क देते हुए कि यह हमारा तेल है और हमें इससे अंग्रेजों की तुलना में अधिक लाभ कमाना चाहिए।
ब्रिटिशों ने जवाबी कार्रवाई करते हुए रॉयल नेवी को अबादान बंदरगाह के चारों ओर नाकाबंदी करने और किसी भी ईरानी तेल टैंकर को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने से रोकने के लिए भेजा। ब्रिटिशों ने ईरान को बाकी दुनिया से पहुंच को पूरी तरह से रोक दिया था। उस वक्त मोसादेघ ने जो हिम्मत दिखाई, उस वजह से वो ईरान के राष्ट्रीय नायक बन गए। मोसादेघ के समर्थन में ईरानी प्रदर्शनकारियों ने शाह को सत्ता से बेदखल कर दिया। शाह को पश्चिमी तेल कंपनियों के हाथों की कठपुतली के तौर पर ईरान में देखा जाता था।
अमेरिका और ब्रिटेन का 1953 का तख्तापलट
इसके बाद 1953 में, ब्रिटिश और अमेरिकियों ने सीआईए (CIA) की मदद से ईरान में तख्तापलट करके मोसादेघ को सत्ता से हटा दिया और शाह को फिर से सत्ता में बैठा दिया था। इसके परिणामस्वरूप एक समझौता हुआ जिसके तहत तेल से होने वाले मुनाफे को ईरान और पश्चिमी तेल कंपनियों के बीच बराबर-बराबर बांटा गया।
2026 में होर्मुज: क्या फिर टकराव की तैयारी है?
आज जो हालात बन रहे हैं और जिस तरह से नाटो देश होर्मुज को खोलने का दबाव ईरान पर डाल रहे हैं, उससे कहीं न कहीं यह सवाल जरूर उठता है कि क्या ब्रिटेन समेत दूसरे नाटो देशों का भी ईरान से टकराव होगा या अमेरिका और ईरान होर्मुज पर कब्जा करेंगे? स्ट्रेट ऑफ होर्मुज हजारों वर्षों से अस्तित्व में है और यह हमेशा से समुद्री व्यापार का केंद्र रहा है, जो मिडिल ईस्ट को मुख्य रूप से भारत से जोड़ता है।
ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो फारस की खाड़ी में तेल को लेकर होने वाले संघर्ष नए नहीं हैं। ऐसे में अब जब होर्मुज एक बार फिर बंद हो चुका है, तो इसको लेकर ब्रिटेन या दूसरे नाटो देश मिलकर दोबारा इस पर कब्जे की कोशिश कर सकते हैं, जिससे 2026 तक यह क्षेत्र बड़े भू-राजनीतिक बदलावों का गवाह बन सकता है। ईरान अपनी सैन्य शक्ति के दम पर इस क्षेत्र में अपनी पकड़ बनाए रखने की पूरी कोशिश करेगा।
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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अधिक जानकारी के लिए, आप विकिपीडिया पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का पेज देख सकते हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ने वाला एक संकरा जलमार्ग है। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 25% हिस्सा संभालता है, जिससे खाड़ी देशों का तेल अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचता है।
ईरान का स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर क्या दावा है?
1979 की ईरानी क्रांति के बाद से ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अपना अधिकार जताया है और अमेरिकी प्रतिबंधों या अन्य तनावों के जवाब में इसे बंद करने की धमकी देता रहा है।
ब्रिटेन का ईरान के तेल से क्या संबंध था?
20वीं सदी की शुरुआत में, ब्रिटेन ने एंग्लो-पर्शियन ऑयल कंपनी (बाद में BP) के माध्यम से ईरान के तेल पर एकाधिकार कर लिया था और उसका बड़े पैमाने पर दोहन किया था।
मोहम्मद मोसादेघ कौन थे और उन्होंने क्या किया?
मोहम्मद मोसादेघ 1951 में ईरान के प्रधानमंत्री थे जिन्होंने ईरानी तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण करके ब्रिटिश एकाधिकार को चुनौती दी थी, जिससे वे ईरान में एक राष्ट्रीय नायक बन गए।
1953 में ईरान में तख्तापलट क्यों हुआ?
1951 में ईरान द्वारा तेल के राष्ट्रीयकरण के बाद, ब्रिटेन और अमेरिका ने 1953 में CIA की मदद से तख्तापलट करके मोहम्मद मोसादेघ को हटा दिया और शाह को दोबारा सत्ता में बैठाया, ताकि पश्चिमी तेल कंपनियों के हित सुरक्षित रहें।
2026 में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास क्या हालात बन सकते हैं?
2026 में, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने की संभावना है। NATO देश ईरान पर इसे खोलने का दबाव बनाए रखेंगे, जिससे ईरान और पश्चिमी शक्तियों के बीच सीधा टकराव हो सकता है, जिसका वैश्विक तेल बाजार पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।