2026: श्रीलंका का चौंकाने वाला फैसला, अमेरिकी युद्धक विमानों को NO!

मुख्य बिंदु

  • 2026 में श्रीलंका ने अमेरिका के दो युद्धक विमानों को अपने देश में उतरने की अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया।
  • राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने संसद में इस फैसले की घोषणा करते हुए तटस्थता बनाए रखने पर जोर दिया।
  • अमेरिका ने ईरान युद्ध के दौरान 4 और 8 मार्च को मट्टाला अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर लैंडिंग की अनुमति मांगी थी।
  • श्रीलंका ने हाल ही में अमेरिकी हमले का शिकार हुए ईरानी युद्धपोत के नाविकों को मानवीय सहायता भी प्रदान की थी।

2026 में श्रीलंका ने एक बड़ा और चौंकाने वाला फैसला लेते हुए अमेरिका को अपनी जमीन पर युद्धक विमानों को उतारने की अनुमति नहीं दी है। यह घोषणा शुक्रवार को श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने संसद में की, जिससे वैश्विक मंच पर देश की स्वतंत्र विदेश नीति और तटस्थता का संदेश स्पष्ट रूप से सामने आया है।

श्रीलंका ने अमेरिकी युद्धक विमानों को क्यों रोका?

राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने संसद को बताया कि अमेरिका ने जिबूती के एक बेस से आने वाले अपने दो युद्धक विमानों के लिए 4 और 8 मार्च को श्रीलंका में लैंडिंग की अनुमति मांगी थी। ये विमान कथित तौर पर आठ एंटी-शिप मिसाइलों से लैस थे और मट्टाला अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर उतरना चाहते थे। हालांकि, श्रीलंका ने इन दोनों अनुरोधों को साफ तौर पर अस्वीकार कर दिया।

श्रीलंका अमेरिका युद्धक विमान

तटस्थता का संकल्प: “हम झुकेंगे नहीं!”

इस फैसले की घोषणा करते हुए राष्ट्रपति दिसानायके ने जोर देकर कहा, “कई दबावों के बावजूद हम अपनी तटस्थता बनाए रखना चाहते हैं। हम झुकेंगे नहीं। मध्य-पूर्व का युद्ध चुनौतियां खड़ी करता है, लेकिन तटस्थ बने रहने के लिए हम हर संभव प्रयास करेंगे।” उनका यह बयान श्रीलंका की विदेश नीति की दृढ़ता को दर्शाता है, खासकर मौजूदा भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच।

अमेरिकी विशेष दूत के साथ मुलाकात

यह महत्वपूर्ण बयान दक्षिण और मध्य एशिया के लिए अमेरिकी विशेष दूत सर्जियो गोर के साथ राष्ट्रपति दिसानायके की मुलाकात के ठीक एक दिन बाद आया है। एक आधिकारिक बयान के अनुसार, दोनों नेताओं ने महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा, बंदरगाहों को सुरक्षित बनाने, व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने और एक स्वतंत्र, खुला व समृद्ध हिंद-प्रशांत क्षेत्र को बढ़ावा देने के अमेरिकी प्रयासों पर चर्चा की थी।

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ईरान युद्ध और अमेरिकी हमला: श्रीलंका की मानवीय भूमिका

अमेरिकी युद्धक विमानों को अनुमति न देने का यह निर्णय ईरान युद्ध के दौरान की कुछ हालिया घटनाओं के बाद आया है। 4 मार्च को अमेरिका ने गाले के पास ईरानी फ्रिगेट ‘आइरिस डेना’ पर टॉरपीडो से हमला कर दिया था, जिसमें 84 नाविक मारे गए थे और 32 को बचाया गया था। यह जहाज़ भारत के विशाखापत्तनम से लौट रहा था।

ईरानी जहाज को दी थी पनाह और मदद

इस हमले के बाद श्रीलंका ने तुरंत मानवीय प्रतिक्रिया दी। श्रीलंकाई नौसेना और वायुसेना ने बड़े पैमाने पर खोज-बचाव अभियान चलाया। उन्होंने 87 शव बरामद किए और 32 घायल ईरानी नौसैनिकों को बचाकर गाले में इलाज करवाया। इसके अलावा, श्रीलंका ने ईरानी सैनिकों के शवों को ससम्मान ईरान भेजा।

दो दिन बाद, 6 मार्च को एक अन्य ईरानी सहायक जहाज ‘आइरिस बुशेहर’ ने इंजन खराबी का हवाला देते हुए श्रीलंका से मदद मांगी। श्रीलंका ने मानवीय आधार पर इसे अनुमति दी और जहाज़ को कोलंबो बंदरगाह से हटाकर पूर्वी बंदरगाह ‘त्रिंकोमाली’ भेजने का निर्देश दिया। कुल 204 नाविकों को अब कोलंबो के पास स्थित नौसैनिक सुविधा केंद्र में ठहराया गया है। यह घटनाक्रम श्रीलंका की तटस्थता की नीति और मानवीय दृष्टिकोण को और पुख्ता करता है।

FAQs: श्रीलंका के इस फैसले से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल

Q1: श्रीलंका ने अमेरिकी युद्धक विमानों को अनुमति देने से क्यों इनकार किया?

A1: श्रीलंका ने अपनी तटस्थता की नीति को बनाए रखने और मध्य-पूर्व में चल रहे संघर्ष से दूर रहने के लिए अमेरिका के युद्धक विमानों को अनुमति देने से इनकार कर दिया। राष्ट्रपति दिसानायके ने स्पष्ट किया कि देश किसी भी दबाव में नहीं झुकेगा।

Q2: अमेरिका ने किस तारीख को और कितने विमानों के लिए अनुमति मांगी थी?

A2: अमेरिका ने 4 और 8 मार्च (2026) को जिबूती के एक बेस से आने वाले दो युद्धक विमानों के लिए श्रीलंका के मट्टाला अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट पर लैंडिंग की अनुमति मांगी थी।

Q3: इन अमेरिकी विमानों में क्या विशेषता थी?

A3: राष्ट्रपति दिसानायके के अनुसार, अमेरिका के ये दोनों लड़ाकू विमान आठ एंटी-शिप मिसाइलों से लैस थे।

Q4: श्रीलंका ने ईरानी युद्धपोत को कैसे मदद पहुंचाई?

A4: 4 मार्च को अमेरिकी हमले का शिकार हुए ईरानी फ्रिगेट ‘आइरिस डेना’ के डिस्ट्रेस सिग्नल पर श्रीलंका ने तुरंत खोज-बचाव अभियान चलाया। उन्होंने 32 घायल नाविकों को बचाया, 87 शव बरामद किए और मानवीय आधार पर ईरानी सहायक जहाज ‘आइरिस बुशेहर’ को भी मदद दी।

Q5: राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके के इस फैसले का क्या महत्व है?

A5: यह फैसला श्रीलंका की स्वतंत्र और तटस्थ विदेश नीति को रेखांकित करता है। यह दर्शाता है कि श्रीलंका बड़े शक्तियों के दबाव में भी अपने सिद्धांतों पर कायम रहने को तैयार है, खासकर अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में।

Q6: इस घटना का हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?

A6: श्रीलंका का यह रुख हिंद-प्रशांत क्षेत्र में क्षेत्रीय संतुलन और समुद्री सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। यह अन्य छोटे देशों को भी अपनी तटस्थता बनाए रखने के लिए प्रेरित कर सकता है, जिससे क्षेत्रीय गतिशीलता प्रभावित होगी।

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